Monday, 23 July, 2007

टोरंटो में नया भव्य हिन्दू मंदिर

खबर आई है...

टोरंटो : किसी सरकारी मदद के बिना 4 करोड़ डॉलर की लागत से भव्य हिन्दू मंदिर का निर्माण किया गया है. बेशकीमती इतालवी पत्थर और तुर्किश बलुआ पत्थर से बने इस मंदिर का नाम है स्वामीनारायण मंदिर. भारतीय-कनाडाई समुदाय ने इसके निर्माण में बढ़चढ़कर योगदान दिया है. मंदिर के निर्माण में डेढ़ साल का वक्त लगा है. मंदिर का ढांचा पूरी तरह से लौहमुक्त है यानी इसके निर्माण में सरिया का प्रयोग नहीं हुआ है. भारत से आए दो हजार कारीगरों ने मंदिर निर्माण के लिए बेशकीमती पत्थरों को तराशा.

समाचार एजेंसी आईएएनएस द्वारा प्रसारित समाचार.


छिद्रान्वेषण...

बगैर सरकारी मदद लिए सामुदायिक प्रयासों से 4 करोड़ डॉलर की रकम जुटा लेना सराहनीय है. इसकी यह कहकर आलोचना हो सकती है कि चार करोड़ डॉलर की रकम से गरीबों के लिए भारत में स्‍कूल या अस्‍पताल बनाया जाता तो ज्‍यादा अच्‍छा होता. मगर जो अप्रवासी अपने देश से इतनी दूर रह रहे हैं, उनके मन में इतना लगाव अपने देश व संस्‍कृति के प्रति होना भी कम महत्‍वपूर्ण नहीं है. धर्म के नाम पर इतनी धनराशि खर्च करना नाजायज हो सकता है, मगर उसी धर्म ने विदेश में इतने लोगों को एकजुट किया है और इतने बढ़े सामुदायिक कार्य के लिए प्रेरित किया है, जिसे नजरंदाज नहीं किया जा सकता. ज्‍यादा बेहतर होता कि इस रकम को सर्वधर्म प्रार्थनाघर बनाने में इस्‍तेमाल किया जाता.

6 खबर का असर:

Udan Tashtari said...

सही खबर आई है. हम गये थे. उनका कम्यूनिटी सेन्टर सारी पब्लिक के लिये है याने कि सर्व धर्म सभा गृह. लोग तो उसका आर्किटेक्चर देखने आ रहे हैं. बहुत ही भव्य एवं विहंगम. आनन्द आ गया.

परमजीत बाली said...

बहुत अच्छी खबर है।धन्यवाद।

vishesh said...

उड़न तश्‍तरी कहां-कहां पहुंच जाती है, मैं हैरान हूं. मगर आपको संशोधन गौरतलब है कि वह सर्वधर्म सभा गृह है. यह बहुत अच्‍छी बात है. मेरे ब्‍लॉग पर टोरंटो की ऑन दि स्‍पॉट रिपोर्ट के लिए साधुवाद.

sanjay tiwari said...

चलिए कुछ भजन-कीर्तन भी हो जाए.

Udan Tashtari said...

आभार आपका विशेष जी, आपने हमारे शहर को कवर किया. रही बात उड़न तश्तरी की, वो कहीं जाये न जाये, मित्रों के ब्लॉग पर जरुर जाती है. :)

चन्दन् said...

खबरफरोश किसी मुर्ख के द्वारा चलाया जा रहा ब्लाग है

ना काहू से दोस्‍ती, ना काहू से बैर

अपन को तो खबर से मतलब है. कहीं से भी आए, मगर उसमें गूदा होना चाहिए.